धारा 138 NI एक्ट : शिकायत में देरी माफ की जा सकती है अगर शिकायतकर्ता इसके पर्याप्त कारण दे : सुप्रीम कोर्ट

धारा 138 NI एक्ट : शिकायत में देरी माफ की जा सकती है अगर शिकायतकर्ता इसके पर्याप्त कारण दे : सुप्रीम कोर्ट


सुप्रीम कोर्ट ने यह कहा है कि निगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट एक्ट की धारा 138 के तहत दायर शिकायत पर अदालत द्वारा निर्धारित अवधि के बाद भी संज्ञान लिया जा सकता है, यदि शिकायतकर्ता अदालत को इस बात को लेकर संतुष्ट करता है कि उसके पास ऐसे समय में शिकायत ना करने का पर्याप्त कारण है।

पटना HC के फैसले के खिलाफ दायर अपील पर आया फैसला


न्यायमूर्ति डी. वाई. चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति हेमंत गुप्ता की पीठ ने पटना उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ एक अपील पर यह फैसला दिया जिसमें चेक बाउंस शिकायत में मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा जारी किए गए एक समन को खारिज कर दिया गया था।


क्या है यह पूरा मामला?

बिहार के बीरेंद्र प्रसाद साह बनाम बिहार राज्य मामले में चेक के अनादर के बाद शिकायतकर्ता ने 31.12.2015 को एक कानूनी नोटिस जारी किया। जब आरोपी जवाब देने में विफल रहा तो शिकायतकर्ता द्वारा 26.02.2016 को एक और नोटिस जारी किया गया। इस दौरान आरोपी ने अपने दायित्व से इनकार करते हुए दूसरे नोटिस का जवाब दिया। ये शिकायत 11.05.2016 को दर्ज की गई थी। शिकायत दर्ज करने में देरी को सीजेएम द्वारा शिकायतकर्ता द्वारा किए गए इस अनुरोध को ध्यान में रखते माफ कर दिया गया कि बीच की अवधि के दौरान वह बीमार पड़ गया था।

लेकिन पटना उच्च न्यायालय ने मुख्य रूप से इस आधार पर समन को रद्द कर दिया था कि चेक के संबंध में कार्रवाई का एक और कारण बनाने के लिए आदाता के लिए यह स्वीकार्य नहीं था।
यह भी देखा गया कि शिकायतकर्ता प्रथम नोटिस जारी करने के 30 दिनों की वैधानिक अवधि के भीतर शिकायत दर्ज करने में विफल रहा जैसा कि NI एक्ट में प्रावधान है।
हुआ MSR लीथर्स बनाम एस पलानप्पन मामले का जिक्र अपील में हालांकि यह शीर्ष अदालत की पीठ के समक्ष तर्क दिया गया था कि MSR लीथर्स बनाम एस पलानप्पन मामले में अदालत की 3 न्यायाधीश पीठ ने यह विचार किया है कि धारा 138 के प्रावधानों के तहत बाद में नोटिस जारी करना स्वीकार्य है लेकिन पीठ ने इस मुद्दे पर विचार नहीं किया।
इसके बजाए पीठ ने यह कहा कि शिकायतकर्ता द्वारा शिकायत को आधार बनाने में देरी के लिए पर्याप्त कारण दर्शाया गया था क्योंकि 31 दिसंबर 2015 को पहला कानूनी नोटिस जारी किया गया था।


इस आधार पर उच्च न्यायालय के आदेश को रद्द करते हुए पीठ ने कहा:


"शिकायत 11 मई 2016 को शुरू की गई थी। धारा 142 (1) के तहत एक शिकायत को उस तारीख के 1 महीने के भीतर स्थापित किया जाना है जिस पर कार्रवाई का कारण प्रावधान की धारा 138 के खंड (ग) के तहत उत्पन्न हुआ है। हालांकि यह साबित करता है कि शिकायत का संज्ञान न्यायालय द्वारा निर्धारित अवधि के बाद लिया जा सकता है, अगर शिकायतकर्ता अदालत को इस बात को लेकर संतुष्ट करता है कि उसके पास ऐसी अवधि के भीतर शिकायत ना करने का पर्याप्त कारण है।"


अपीलकर्ता ने निर्धारित अवधि के भीतर शिकायत को दर्ज में सक्षम नहीं होने के लिए पर्याप्त और पर्याप्त कारणों का संकेत अदालत को दिया है।
सीजेएम ने उक्त देरी को माफ कर दिया और इसके पीछे के कारण के चलते अपीलार्थी द्वारा 6 अप्रैल 2018 से शुरू होने की अवधि के लिए दिखाया गया था। हालांकि अगर शिकायत के पैराग्राफ 7 और 8 को एक साथ पढ़ा जाता है, तो यह स्पष्ट है कि अपीलकर्ता ने शिकायत में देरी की माफी मांगने के लिए पर्याप्त कारण का संकेत दिया था।

पटना उच्च न्यायालय ने केवल यह अनुमान लगाया है कि यदि पहला नोटिस भेज दिया गया है तो उसे ही माना जाएगा। यदि वह अनुमान लागू होता है तो भी हम यह मानते हैं कि शिकायत के आधार पर देरी करने के लिए अपीलकर्ता द्वारा पर्याप्त कारण दर्शाया गया था जिसमें शिकायत को आधार बनाते हुए पहला कानूनी नोटिस दिनांक 31 दिसंबर 2015 को जारी किया गया था।"

Comments

Popular posts from this blog

BNSS vs CrPC: 5 Critical Procedural Changes Every Lawyer Must Master in 2026

Criminal Proceedings Cannot Be Used to Settle Civil Scores in Property Deals": P&H HC Quashes FIR — Full Analysis

SARFAESI Act 2026: Key DRAT Judgments — What Property Owners and Borrowers Must Know